वो ख़तरनाक शूटर जिससे हिटलर की फ़ौज भी डरती थी, जिसने सिर्फ़ 25 साल की उम्र में वर्ल्ड वार सेकेण्द के दौरान 309 लोगों को मौत के घाट उतार दिया था.
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ये कहानी उस लड़की की है जिसने सिर्फ़ 25 साल की उम्र में वर्ल्ड वार सेकेण्द के दौरान 309 लोगों को मौत के घाट उतार दिया था जिनमें से ज्यादातर हिटलर के फौजी थे. इस लड़की को इतिहास की सबसे ख़तरनाक और ज़ालिम निशानेबाज़ का दर्जा हासिल है जिसको ल्यूडमिला पेवलीचेंको के नाम से जाना जाता है। इसने हिटलर और उसके फौजियों का जीना मुश्किल कर दिया था, नाज़ी फौजी इसके नाम से ही थर थर काँपते थे।आइए जानते हैं इस साहसी महिला की कहानी
ल्यूडमिला पेवलीचेंको (जुलाई 12, 1916 - अक्टूबर 10, 1974) वर्ल्ड वार सेकेण्द के वक्त यूक्रेनियन सोवियत स्नाइपर थीं. स्नाइपर बनकर इस महिला ने 309 को मौत के घाट उतारा था. ल्यूडमिला को इतिहास की सबसे कामयाब फीमेल निशानेबाज़ कहा जाता है.
कुछ दिन में ही पेवलिचेंको ने हथियार चलाने में महारत हासिल कर ली.22 जून, 1941 में जर्मनी ने जर्मन-सोवियत
के बीच की आक्रमण ना करने की ;( Treaty) संधि को तोड़ दिया और ऑपरेशन बारबरोसा शुरू किया. इस ऑपरेशन के तहत जर्मनी ने
सोवियत संघ पर अटैक कर दिया.
जंग के हालात को देखते हुये ल्यूडमिला पेवलिचेंको ने अपने मुल्क की हिफाज़त के लिए कीव के यूनिवर्सिटी में चल रही अपनी इतिहास की पढ़ाई छोड़कर आर्मी में ज्वाइन करने फ़ैसला किया.
आर्मी में पहले तो उन्हें लेने से इनकार कर दिया गया. लेकिन जब उन्होंने निशानेबाज़ी
में अपना हुनर दिखाया तो आर्मी ने उन्हें रेड आर्मी के साथ ऑडिशन का एक मौका दिया.
रिक्रूटिंग ऑफिस में पेवलिचेंको पहले राउंड में भर्ती होने वाले वॉलंटियर्स में से थीं. यहीं पर उन्होंने इंफेंट्री ज्वाइन करने की अपील की उसके बाद उन्हें रेड आर्मी की 25वीं राइफल डिवीजन में जगह मिली. और वह रेड आर्मी की 2 हजार (Female Snipers) महिला स्नाइपर्स में से एक बनीं. इनमें से युद्ध के बाद 500 ही ज़िन्दा बचीं. सबसे पहले उन्होंने बेल्यायेवका में टोकरेव एसवीटी-40 सेमी ऑटोमैटिक राइफल से दो लोगों को मार गिराया.
पेवलीचेंको ने ओडेसा के पास ढाई साल तक लड़ाई लड़ी, जहां उन्होंने 187 लोगों को मारा था. जब रोमानिया को ओडेसा पर नियंत्रण मिल गया, तब उनकी यूनिट को सेवासटोपोल भेजा गया. यहां पेवलीचेंको ने 8 महीने तक लड़ाई लड़ी. मई 1942 तक लेफ्टिनेंट पेवलीचेंको 257 जर्मन सैनिकों को मार चुकी थीं. द्वितीय विश्व युद्ध में उनके द्वारा प्रमाणिक हत्याओं की संख्या 309 है और इसमें दुश्मन देश के 36 स्नाइपर्स भी हैं.जून 1942 में, पेवलीचेंको मोर्टार फायर में घायल हो गईं. बढ़ते खतरे और अपने नाम की चर्चा की वजह से उन्होंने कॉम्बैट से अपने कदम पीछे खींच लिए.
पेवलीचेंको को कनाडा और युनाइटेड स्टेट विजिट पर भेजा गया. वह
सोवियत यूनियन की पहली नागरिक बनीं, जिनकी अगवानी अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूज़वेल्ट ने व्हाइट हाउस में की.
वॉशिंगटन की यात्रा पर ल्यूडमिला पेवलिचेंको के साथ व्लादीमिर पचेलिनत्सेव भी गए थे.
युनाइटेड स्टेट ने उन्हें एक सेमी ऑटोमैटिक पिस्टल गिफ्ट की और कनाडा में उन्हें विनचेस्टर राइफल दी गई जिसे मॉस्को के सेंट्रल आर्म्ड फोर्स के म्यूजियम में रखा गया है. सोवियत संघ लौटते हुए पेवलिचेंको ब्रिटेन भी गईं थीं. यहां उन्होंने ब्रिटेन से वेस्टर्न फ़्रंट में शामिल होने की अपील की थी.मेजर की रैंक मिलने के बाद भी पेवलीचेंको ने कभी भी कॉम्बैट
में वापसी नहीं की. वह एक इंस्ट्रक्टर बन गईं और युद्ध खत्म होने तक सोवियत स्नाइपर्स
को ट्रेंनिंग देने का काम करने लगीं. 1943 में, उन्हें सोवियत यूनियन के हीरो
के तौर पर गोल्ड स्टार की उपाधि दी गई.
इतिहास में उनके किरदार पर कई तरह के सवाल उठे. ल्यूबा विनोग्राडोवा ने अपनी किताब 'अवेंजिंग एंजल्स' में कई सवाल उठाए थे.
ल्यूडमिला पेवलिचेंको को सबसे
ज़्यादा मौतों का श्रेय देने की बात पर सवाल उठाते हुए उन्होंने अपनी किताब में लिखा,
कि 187 दुश्मनों को मौत के घाट उतारा, लेकिन ये बहुत अजीब है कि उन्हें ओडेसा में कोई मेडल नहीं मिला. जबकि 10 दुश्मनों को मारने या घायल करने पर निशानेबाज़ों को एक मेडल सम्मान के तौर पर
दिया जाता है और हर 20 को मारने पर आर्डर
ऑफ़ रेड स्टार. अगर 75 दुश्मनों
को मौत के घाट उतार दिया तो
'हीरो ऑफ़ सोवियत यूनियन'
का ख़िताब देने के लिए काफ़ी है तो उन्होंने क्यों उसे कुछ नहीं दिया. कई लेखकों ने इस बात
पर भी सवाल उठाए कि कहा जाता है कि उन्हें चेहरे पर चोटें आई थीं, लेकिन तस्वीरों में चेहरे पर कोई निशान नज़र नहीं
आता.
ल्यूडमिला पेवलिचेंको कई बार पत्रकारों के कुछ सवालों से ख़फ़ा भी हो जाती थीं.
एक बार किसी पत्रकार ने पूछा कि क्या आप युद्ध के मैदान पर मेकअप करके जाती हैं.
तो पेवलिचेंको ने पत्रकार को जवाब दिया, "ऐसा कोई नियम नहीं है कि युद्ध में मेकअप करके नहीं जा सकते, लेकिन उस वक्त किसके पास ये सोचने का समय होता है कि युद्ध के बीच आपकी नाक कितनी चमक रही है?"
उनकी स्कर्ट की लंबाई पर भी सवाल उठाया गया था. इसके जवाब में उन्होंने कहा था, "अपनी यूनिफ़ॉर्म को इज़्ज़त से देखती हूं. इसमें मुझे लेनिन का ऑर्डर नज़र आता है और ये युद्ध के लहू में लिपटी है."
1942 में उन्होंने टाइम मैगज़ीन से कहा था, "ऐसा लगता है कि अमरीकियों के लिए अहम बात ये है कि महिलाएं यूनिफ़ॉर्म के नीचे क्या सिल्क की अंडरवीयर पहनती हैं. लेकिन उन्हें ये जानना होगा कि यूनिफ़ॉर्म क्या रिप्रेज़ेंट करती है."
युद्ध के बाद उन्होंने कीव यूनिवर्सिटी से अपनी शिक्षा पूरी की और इतिहासकार के तौर पर अपने करियर को आगे बढ़ाया. 1945 से 1953 तक उन्होंने सोवियत नेवी के चीफ हेडक्वॉर्टर में रिसर्च असिस्टेंट की नौकरी की. 10 अक्टूबर 1974 को 58 साल की उम्र में वेपलीचेंको की मौत हो गई और उन्हें मॉस्को में ही दफन किया गया.









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