15 August Independence Day Special | शेरिंग अंग्मो शुनु Tsering Angmo Shunu | Kargil War 1999 | Discover Facts & History

 शेरिंग अंग्मो शुनु-Tsering Angmo Shunu

स्वतंत्रता दिवस हमारी आज़ादी का जश्न मनाने का एक तरीका है और हमारे राष्‍ट्रीय गर्व की भावना को प्रदर्शित करने का एक बेहतर अवसर भी है। क्रांतिकारियों के संयुक्त प्रयासों से आखिरकार 15 अगस्त 1947 को हमें अंग्रेज़ों से आज़ादी मिली। तब से, हर बरस 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस के रूप में पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है। हमारे इस कौमी त्यौहार के मौके पर हम आपको एक शेरनी से रूबरू कराना चाहते हैं जिसने अपनी जान की परवाह किये बिना कारगिल युद्ध के दौरान देश के लिए खुद को और अपने नौजवान बेटे को न्यौछावर करने का फैसला लिया। आईये इस शेरनी के बारे में जानने की कोशिश करते हैं।



शेरिंग अंग्मो शुनु-Tsering Angmo Shunu ने कारगिल वार के दौरान अकेले ही संभाला था एयर स्टेशन

जून 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तानी रेडियो द्वारा भारतीय सैनिकों और भारतीय सेना के हेलिकॉप्टर्स को मार गिराए जाने की झूठी खबरों और अफवाहों को फैलाने से रोकने में ऑल इंडिया रेडियो की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इस लिए एक शाम ऑल इंडिया रेडियो स्टेशन (एआईआर) पर दुश्मनों ने भारी गोलीबारी की जिसकी वजह से इंजीनियर और टेक्निशियन वगैरह मौके से भाग गए, जबकि रेडियो ब्राडकास्ट का वक्त शाम 5 बजे पहले से ही तय था। इस बीच एआईआर, लेह और कारगिल स्टेशन डायरेक्टर शेरिंग अंग्मो शुनु ने ब्राडकास्ट के लिए कारगिल के ब्रिगेड कमांडर से मदद मांगी। उन्होंने कुछ सैनिकों को मदद के लिए भेजा जिन्होंने जनरेटर चालू करने में मदद की। इस तरह शाम 5 बजे ब्राडकास्ट शुरू हो सका


युद्ध के दौरान

स्टेशन डायरेक्टर शेरिंग अंग्मो शुनु पाकिस्तानियों के प्रोपेगैंडा को रोकने के लिए न केवल ब्राडकास्ट जारी रखा, बल्कि सैनिकों को ज़रूरी मैसेज भेजकर उनके हौसले को भी बढ़ाया। जब भारतीय सेना को अपने सैनिकों की सहायता के लिए लोगों की आवश्यकता थी, तो उन्होंने लगातार जनता से गुज़ारिश भरे मैसेज शेयर किय और अपने 18 वर्षीय बेटे को सेना की मदद करने के लिए भेजा।


कारगिल युद्ध के समाचार का प्रसारण

6 जून 1999 को लद्दाख के लोगों ने ऑल इंडिया रेडियो (AIR) पर कारगिल वॉर की खबरें सुनने के लिए रेडियो चालू किया। ब्राडकास्ट के दौरान हिंदी में एक खास ऐलान किया।

अंग्मो ने कहा भारतीय सेना को सामान आगे पहुंचाने के लिए लोगों की ज़रूरत है। कृपया मदद के लिए आगे आएं, देश को आपकी जरूरत है।

अगले हफ्ते तक लगातार,  रेडियो पर इसी तरह क ऐलान किया गया जिसमें स्थानीय लोगों से सेना की मदद की अपील की गई। यह ऐलान कर्नल विनय दत्ता के आदेश पर किया गया था।


कर्नल दत्ता ने शेरिंग अंग्मो शुनु को बताया था कि युद्ध में हमला करने वाली बटालियन्स की जरूरतों को पूरा करने के लिए कंपनी द्वारा जवानों की भर्ती की जा रही है।

हर सुबह शेरिंग अंग्मो शुनु अपने निर्धारित प्रसारण के बीच में श्रोताओं को बताती रहती थीं कि भारतीय सेना हमारे लिए लड़ रही है। उनक मदद की ज़रूरत है।


वॉलंटियर के रूप में अपने बेटे को भेजना

लेह जिले में खेतिहर परिवार में जन्मी शेरिंग अंग्मो शुनु के पिता नायब तहसीलदार थे। शेरिंग अंग्मो शुनु ने बताया, “एमए फर्स्ट इयर की पढ़ाई पूर करने के बाद मेरी शादी हो गई और 1975 में कार्यक्रम अधिकारी के रूप में मुझे ऑल इंडिया रेडियो लेह में तैनात किया गया

शेरिंग अंग्मो शुनु ने भारी गोलाबारी के बीच न सिर्फ ऑल इंडिया रेडियो कारगिल का नियमित प्रसारण किया बल्कि अपने 18 साल के बेटे स्टैनज़िन जयदुन उर्फ (रिकी) को वालंटियर के रूप में कार्य करने के लिए भेजा।

सिर्फ चार दिनों के भीतर रिकी जैसे 200 लद्दाखी वालंटियर के तौर पर सेना के साथ हो गए। यह तादाद हफ्ते के अंत तक बढ़कर 800 हो गई। इन वालंटियर्स के अंदर न केवल मातृभूमि की रक्षा का जज्बा था बल्कि उन्हें वहां के मौसम, ऊंचे स्थानों और इलाके की अच्छी समझ भी थी। स्थानीय रेडियो ने नागरिकों से खच्चरों की व्यवस्था कर ऊंचे स्थानों पर, जहाँ लड़ाई चल रही थी, सेना के सामान को पहुंचाने में मदद करने के लिए कहा। उन दिनों कारगिल में औसतन 300 पाकिस्तानी गोले रोजाना गिरते थे इसके बावजूद एक दिन के लिए भी काम बंद नहीं हुआ।


दुश्मनों के प्रोपेगैंडा को विफल करना

किसी भी युद्ध में संचार का माध्यम सबसे ज्यादा चपेट में आता है। आकाशवाणी कारगिल के पास नियमित गोलाबारी होती थी और कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए स्टेशन को बंद करने पर विचार किया गया।

अंग्मो याद करते हुए बताती हैं, “जिस समय गोलाबारी शुरू होती, हम ज़ांस्कर की ओर 15 किमी दूर स्थित मिंगी नामक एक छोटे से गांव में तेजी से कूद जाते जो दुश्मन की गोलाबारी की सीमा से बाहर था।


युद्ध के दिनों को याद करते हुए शेरिंग अंग्मो शुनु बताती हैं, “पाकिस्तान की ओर से हर रोज गोलाबारी हो रही थी। बहुत सारे गोले रेडियो स्टेशन परिसर में गिरते थे जिसके कारण हॉस्टल ध्वस्त हो गया। मेरे कुछ साथी मुश्किल से अपनी जान बचाकर भागे थे। कस्बा सुनसान था। सेना ने हमें लाइट बंद रखने के लिए कहा, लेकिन गोले वैसे भी गिरते रहे। मैंने किसी तरह स्टेशन को चालू रखा। कभी-कभी, टेक्निशियन मदद करने से मना कर देते और मुझे सेना के टेक्निशियन को प्रसारण शुरू करने के लिए कहना पड़ता। युद्ध के समय नियम और कानून कभी कभी काम नहीं करते हैं। दिल्ली के लोगों ने भी मुझे भागने के लिए कहा, लेकिन मैं स्टेशन को चालू रखने के अपने फैसले पर अड़ी रही।

26 जुलाई को भारतीय सशस्त्र बलों की जीत के साथ युद्ध समाप्त हो गया। हमारे सैनिकों ने युद्ध के दौरान मज़बूती से संघर्ष किया और देश सेवा की। उनके योगदान को आधिकारिक तौर पर मान्यता दी गई। सेना के महत्वपूर्ण योगदान के साथ ही उन सैकड़ों लद्दाखी नागरिकों को नहीं भूलना चाहिए जिन्होंने अंग्मो की तरह युद्ध में अपना अतुलनीय योगदान दिया। और यही वजह है कि हमारी सेना ने कारगिल युद्ध में पाकिस्तानियों को बुरी तरह से हरा कर देश का मान सम्मान कायम रखा और इसे बढ़ाया।














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